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डिजिटल तकनीक से कुछ ही घंटों में बनने हैं नकली दांत
– इंडियन एकेडेमी ऑफ़ एस्थेटिक एंड कॉस्मेटिक डेन्टिस्ट्री द्वारा करवाई जा रही 28 वीं एनुअल कॉन्फ्रेंस 2019 के अंतिम दिन डेंटिस्ट्री में नई तकनीकों के बारे में दी गई जानकारी
इंदौर। आज नकली दांत बनाने के लिए दो तकनीक उपलब्ध है पहली एनालॉग, जिसमे मेनुअल तरीके से दांतों का नाप लेकर लैब में दांत तैयार किया जाता है। फ़िलहाल यही तरीका प्रचलित भी है क्योकि यह अपेक्षाकृत सस्ता है। दूसरा ज्यादा आधुनिक और सटीक तरीका है डिजिटली कंप्यूटर के जरिए नकली दांत तैयार करने का।
रविवार को इंडियन एकेडेमी ऑफ़ एस्थेटिक एंड कॉस्मेटिक डेन्टिस्ट्री द्वारा करवाई जा रही 28 वीं एनुअल कॉन्फ्रेंस 2019 के अंतिम दिन ‘स्टॉर्म इन अ टी कप’ सेशन में नकली दांत बनाने की इन्ही दोनों तकनीकों पर त्रिवेंद्रम से आए डॉ सेगिन चंद्रन और दिल्ली से आए डॉ सुशांत उमरे ने चर्चा की।
इस चर्चा में बताया गया कि एनालॉग तकनीक जहाँ किफायती होने के कारण आम जनता की पहुंच में है वही डिजिटल तकनीक में इंट्रा ओरल स्कैनर के जरिए बत्तीसी का नाप लेकर सीधे मिलिंग मशीन में भेज दिया जाता है, जिससे बिलकुल सटीक नाप का दांत बनता है। इस तकनीक से सिर्फ कुछ ही घंटों में दांत बनकर मरीज को लगाने के लिए तैयार हो जाता है जबकि पुरानी तकनीक तीन से चार दिन का समय लेती है।
डिजिटली तैयार दांत बिलकुल सटीक नाप का होता है, इस कारण मरीज का चेयर पर सिटींग टाइम कम हो जाता है। इस तरह यह तकनीक मरीज और डॉक्टर दोनों का समय बचाती है। इस तकनीक में अधिक विकास होने के बाद इसकी कीमत भी काफी कम हो जाएगी,जिससे इसका लाभ सिर्फ एक तबके तक सीमित ना रहकर आम जनता को भी मिल पाएगा।
आर्टिफिशियल लेयरिंग के जरिए तैयार करते हैं डेंटल इल्यूजन
यदि किसी हादसे में आपके सामने के किसी एक दांत में फ्रेक्चर हो जाए और आपको उसे ठीक करवाना पड़े या नकली दांत लगवाना तो क्या वह हूबहू आपके असली दांतों की तरह दिखेगा? पहले यह संभव नहीं था पर अब कॉस्मेटिक लेयरिंग के जरिए यह पूरी तरह संभव है। इसी नई तकनीक के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दी डॉ सोनाली गाँधी, डॉ वर्षा राव और डॉ प्रिया सिंह ने।
इस तकनीक के जरिए नकली दांत का कलर, शेड और टेक्सचर हूबहू आपके असली दांतों की तरह बनाया जा सकता है, जिससे किसी को भी यह नहीं पता लगेगा कि आपका कोई एक दांत नकली है। कॉन्फ्रेंस में साइबर मैश के बारे में भी जानकारी दी गई। कॉस्मेटिक फीलिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला यह मटेरियल सामान्य मटेरिल से कई गुना ज्यादा टिकाऊ होता है।
डेंटल टेक्निशियंस की ट्रेनिंग
कॉन्फ्रेंस के अंतिम दिन डेंटल लैब्स में काम करने वाले टेक्निशियंस के लिए खास ट्रेनिंग सेशन भी रखा गया था, जिसमे उन्हें एनालॉग और डिजिटल दोनों तरीकों से नकली दांत बनाना सिखाया गया। नई तकनीकों के साथ ही नए मटेरिल और इंस्ट्रूमेंट्स की जानकारी भी दी गई। इसके साथ ही यहाँ ट्रेड शो भी था, जिसमे डेंटिस्ट्री से जुड़े नए प्रोडक्ट्स और इंस्ट्रूमेंट्स को डिस्प्ले किया गया था। यहाँ से इन चीजों को ख़रीदा भी जा सकता था।
सोडा नहीं है सभी के लिए

समापन सत्र में कॉन्फ्रेंस की ऑर्गनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ रुम्पा विग ने बताया कि एक आम भ्रांति है कि सोडे को दांतों पर घिसने से दांत अच्छे साफ हो जाता है जबकि यह गलग है। सोडा अलग – अलग पीएच स्तर के लिए अलग-अलग तरह से काम करता है इसलिए सभी पर इसका असर अलग होता है।
आम लोगों को दांतों की देखभाल के लिए टिप्स देते हुए उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग हाथ आगे-पीछे करते हुए ब्रश करते हैं, जिससे सिर्फ दांत घिसते हैं उनकी सफाई। दांतों की ठीक से सफाई करने के लिए ब्रश गोल-गोल घूमते हुए कीजिए ,जिससे सारी केविटी बाहर निकल जाएगी और दांत लम्बे समय तक सुरक्षित रहेंगे।
कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाजिंग सेक्रेटरी डॉ स्वर्णजीत एस. गंभीर ने कहा कि इस तीन दिनी कॉन्फ्रेंस के दौरान एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री के क्षेत्र में कई नई तकनीकों के बारे में जानकारी मिली। सभी डेलीगेट्स ने वर्कशॉप में हिस्सा लेने के साथ ही मॉडल्स पर हैंड्स ऑन ट्रेनिंग भी प्राप्त की। चहरे को सुन्दर बनाने और स्माइल डिज़ाइनिंग के नए तरीके सीखे।
इस तरह की कॉन्फ्रेंस से ना सिर्फ डेंटल प्रोफेशनल्स की स्किल्स डेवेलप होती है बल्कि लोगों में भी जागरूकता आती है। नए स्किलफुल डेंटिस्ट तैयार होने से अब लोगों को एस्थेटिक्स एंड कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री से जुड़े प्रोसिजर्स के लिए अब मेट्रो सिटीज का रुख नहीं करना पड़ेगा, जिससे उनके समय और पैसे दोनों की बचत होगी।


